निराशा से आशा की ओर
आज कोरोना काल में संपूर्ण मानवता जैसे निराशा में डूब गई है। लगने लगा है जैसे खुशियों का सूरज डूब सा गया है। चारों ओर निराशा ने अपना घर बना लिया है। निराश जीवन, क्या करें क्या ना करें, समझ में नहीं आता। जीवन-मृत्यु के बीच फंस कर रह गया है मानव। घर के अंदर कैसे समय बिताएं और बाहर कोरोना का पहरा है। जीवन से जुड़े सभी कार्य भी करने आवश्यक है। एक बार रोग लग गया तो पता नहीं बचेंगे भी या नहीं। निराश मन कार्य करे जा रहा था। शनै शनै समय बीता और आशा की किरण ने दरवाजे पर दस्तक दी। ज्ञात हुआ कि कोरोना की दवा बनने लगी है और बाज़ार में जल्दी ही आ जाएगी। निराश और हताश मन को कुछ राहत मिली। दावा किया गया कि दवा से सभी स्वस्थ हो सकेंगे। अनायास ही हृदय प्रफुल्लित हो गया। अभी तो दवा पास आई भी नहीं कि मन स्वस्थ हो गया। लगने लगा जैसे यह जीवन फिर से पहले जैसा हो जाएगा। अब हमें भयभीत या निराश नहीं होना चाहिए। ...