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बेटी की पढ़ाई

आज सेठानी बहुत प्रसन्नी थीं। उनकी बेटी गौरी का बारहवीं का परीक्षा परिणाम जो घोषित हुआ था। घर में खूब चहल-पहल थी। आज शाम को घर में आयोजन था। खूब तैयारियां चल रही थीं। सेठानी नौकरों को डांट-डांट कर काम करा रही थी। एक काम को इधर से उधर ना होने दे रही थी। तभी सेठानी ने ज़ोर से आवाज लगाई -  "परवतिया.. ओ परवतिया! इतना सारा काम पड़ा है और तूने अभी बर्तन भी नहीं धोए।" "अबही करूंहूं मलिकिन।" परवतिया बोली।      चारों ओर बंदनवार लगे थे। हवेली एकदम दुल्हन की तरह सजाया गई थी। तरह-तरह के व्यंजन बनाए गए थे। दूर-दूर से रिश्तेदार आने शुरू हो गए। उनमें से एक ने सेठ जी से कहा - "भाई साहब, अब तो बिटिया बड़ी हो गई है, उसकी शादी की तैयारियां भी शुरू कर दीजिए।" सेठानी यह सब सुन रही थी। उसे बहुत बुरा लगा। उसने सेठ से कहा - "जी कहे देती हूं, गौरी की पढ़ाई जब तक पूरी नहीं हो जाएगी, और उसकी नौकरी ना लग जाती, तब तक उसकी शादी नहीं करने दूंगी।"          परवतिया अंदर काम करते हुए सब सुन रही थी। उसने सोचा मालकिन बहुत खुश हैं। आज ही अपनी बेटी मुन्नी के लिए छुट्टी मांग लूंगी।...

निरोग की राह... योग

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"ज़रा मेरे दर्द की दवा देना।"  "अभी लाया दादी!" " हाय मेरी कमर..." कहते-कहते दादी धम्म से पलंग पर बैठ गईं। और सोचने लगी "इन मरी सीढ़ियों ने तो मेरी जान ही निकाल दी"।  "दादी मैंने कितनी बार कहा है कि आप योगा करो लेकिन आप मानती ही नहीं" मुंह बनाकर कहा उस दस साल की बच्चे ने।  साठ की उम्र में दादी अस्सी की लगने लगी थीं। ऊपर से शाही दावतों का सा खाना। कौन सा रोग था जो ना लगा था। पर मजाल क्या जो उनसे कोई परहेज़ करवा सके!       एक-एक करके सब को डांटती थीं। बहुएं तो सिर झुकाए बस सुनती थीं। आवाज़ ऐसी कड़कती कि राह चलता सुने तो डर जाए। बैठे-बैठे शरीर फैलता जा रहा था। पूरी सेठानी लगती थीं। और अब तो यह हालत थी कि एक बार भी सीढियां चल लेतीं तो सांस ऐसी फूलती की जान निकल जाएगी। पढ़ी-लिखी और शान और शौकत वाली दादी योग तथा आयुर्वेद में विश्वास नहीं करती थीं। मायके से ससुराल तक कई-कई नौकर रहते थे दादी के।        लेकिन आज कोरोना काल में साठ से अधिक उम्र और बीमार लोगों को घर से निकलने की मनाही थी। बिट्टू के स्कूल में सिखाया गया था कि योग करने स...