बेटी की पढ़ाई
आज सेठानी बहुत प्रसन्नी थीं। उनकी बेटी गौरी का बारहवीं का परीक्षा परिणाम जो घोषित हुआ था। घर में खूब चहल-पहल थी। आज शाम को घर में आयोजन था। खूब तैयारियां चल रही थीं। सेठानी नौकरों को डांट-डांट कर काम करा रही थी। एक काम को इधर से उधर ना होने दे रही थी। तभी सेठानी ने ज़ोर से आवाज लगाई - "परवतिया.. ओ परवतिया! इतना सारा काम पड़ा है और तूने अभी बर्तन भी नहीं धोए।"
"अबही करूंहूं मलिकिन।" परवतिया बोली।
चारों ओर बंदनवार लगे थे। हवेली एकदम दुल्हन की तरह सजाया गई थी। तरह-तरह के व्यंजन बनाए गए थे। दूर-दूर से रिश्तेदार आने शुरू हो गए। उनमें से एक ने सेठ जी से कहा - "भाई साहब, अब तो बिटिया बड़ी हो गई है, उसकी शादी की तैयारियां भी शुरू कर दीजिए।" सेठानी यह सब सुन रही थी। उसे बहुत बुरा लगा। उसने सेठ से कहा - "जी कहे देती हूं, गौरी की पढ़ाई जब तक पूरी नहीं हो जाएगी, और उसकी नौकरी ना लग जाती, तब तक उसकी शादी नहीं करने दूंगी।"
परवतिया अंदर काम करते हुए सब सुन रही थी। उसने सोचा मालकिन बहुत खुश हैं। आज ही अपनी बेटी मुन्नी के लिए छुट्टी मांग लूंगी। जब सेठानी अंदर आई तो परवतिया बोली - "मलिकिन म्हार बिटिया मुन्नी के लाने छुट्टी दै दो। वो अब सै पढ़न जावेगी पास ही के सरकारी स्कूल में।" परवतिया एक हल्की मुस्कान के साथ बोली।
सेठानी यह सुनकर आग बबूला हो बोली, "कोई छुट्टी नहीं दूंगी। वह काम नहीं करेगी तो क्या करेगी। पढ़-लिख कर क्या करना है उसे! आगे चलकर शादी के बाद घर ही तो संभालना है।"
परवतिया निःशब्द सेठानी को देख रही थी। अभी तो बाहर सेठानी कुछ और ही थीं ।
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