Posts

Showing posts with the label love

निरोग की राह... योग

Image
"ज़रा मेरे दर्द की दवा देना।"  "अभी लाया दादी!" " हाय मेरी कमर..." कहते-कहते दादी धम्म से पलंग पर बैठ गईं। और सोचने लगी "इन मरी सीढ़ियों ने तो मेरी जान ही निकाल दी"।  "दादी मैंने कितनी बार कहा है कि आप योगा करो लेकिन आप मानती ही नहीं" मुंह बनाकर कहा उस दस साल की बच्चे ने।  साठ की उम्र में दादी अस्सी की लगने लगी थीं। ऊपर से शाही दावतों का सा खाना। कौन सा रोग था जो ना लगा था। पर मजाल क्या जो उनसे कोई परहेज़ करवा सके!       एक-एक करके सब को डांटती थीं। बहुएं तो सिर झुकाए बस सुनती थीं। आवाज़ ऐसी कड़कती कि राह चलता सुने तो डर जाए। बैठे-बैठे शरीर फैलता जा रहा था। पूरी सेठानी लगती थीं। और अब तो यह हालत थी कि एक बार भी सीढियां चल लेतीं तो सांस ऐसी फूलती की जान निकल जाएगी। पढ़ी-लिखी और शान और शौकत वाली दादी योग तथा आयुर्वेद में विश्वास नहीं करती थीं। मायके से ससुराल तक कई-कई नौकर रहते थे दादी के।        लेकिन आज कोरोना काल में साठ से अधिक उम्र और बीमार लोगों को घर से निकलने की मनाही थी। बिट्टू के स्कूल में सिखाया गया था कि योग करने स...

किट्टू... ओ किट्टू

Image
एक दिन सुबह मैं छत पर एक कोने में खड़ी प्रकृति की छटाएं देख रही थी। ठंडी हवाएं, चिड़ियों का चहचहाना, दूर शांत आकाश में चलते हुए मेघ मेरे एकाकी मन को प्रफुल्लित कर रहे थे। मौसम सुहावना था क्योंकि सावन ने दस्तक दे दी थी। इन सब प्राकृतिक दृश्यों में जैसे मैं खो ही गई थी। मेरे घर के आगे एक नीम का पेड़ है, उसकी शाखाएं मेरी बालकनी तक फैली हुई है। मैं टहलते-टहलते उस पेड़ के पास जाकर खड़ी हो, उसके बेहद कोमल नए पत्तों को निहारने लगी। वे शाखाएं और पत्ते हवा से लहरा कर मेरे पास तक आते मानो कह रहे हो कि वे मेरे समीप रहने से प्रसन्न हैं।                          अचानक तभी मैंने पेड़ के तने में से किसी जीव को अपनी दो आंखें चमकाते हुए देखा। मुझे यह समझने में देर नहीं लगी कि वह गिलहरी का बच्चा है। वह बाहर नहीं आ रहा था। वह डर रहा था। मैं धीरे-से उसके पास गई तो वह वहां से भाग गया।                     मैं वही खड़ी अपनी स्मृतियों में खो गई। बचपन में मेरी प्रिय लेखिका महादेवी वर्मा...

निराशा से आशा की ओर

Image
आज कोरोना काल में संपूर्ण मानवता जैसे निराशा में डूब गई है। लगने लगा है जैसे खुशियों का सूरज डूब सा गया है। चारों ओर निराशा ने अपना घर बना लिया है। निराश जीवन, क्या करें क्या ना करें, समझ में नहीं आता। जीवन-मृत्यु के बीच फंस कर रह गया है मानव। घर के अंदर कैसे समय बिताएं और बाहर कोरोना का पहरा है। जीवन से जुड़े सभी कार्य भी करने आवश्यक है। एक बार रोग लग गया तो पता नहीं बचेंगे भी या नहीं। निराश मन कार्य करे जा रहा था।                             शनै शनै समय बीता और आशा की किरण ने दरवाजे पर दस्तक दी। ज्ञात हुआ कि कोरोना की दवा बनने लगी है और बाज़ार में जल्दी ही आ जाएगी। निराश और हताश मन को कुछ राहत मिली। दावा किया गया कि दवा से सभी स्वस्थ हो सकेंगे। अनायास ही हृदय प्रफुल्लित हो गया। अभी तो दवा पास आई भी नहीं कि मन स्वस्थ हो गया। लगने लगा जैसे यह जीवन फिर से पहले जैसा हो जाएगा। अब हमें भयभीत या निराश नहीं होना चाहिए।                         ...

मेरे घर के दो पहरेदार

Image
 क्या कभी किसी ने बिना वेतन की पहरेदारी करते देखा है? जो कभी किसी से कुछ भी नहीं लेता। मैंने देखा है, वे दो अंजाने से मेरे घर की न जाने कितने दिनों से पहरेदारी कर रहे हैं। और इन्हें आम भाषा में कहा जाता है "स्ट्रीट डॉग"। जिन्हें कोई भाव नहीं देता। जिन्हें खाना देने से भी शान घटती है। जब भी बचा, डाल दिया। और कर दिया उन पर एहसान। बचा कुचा खाकर भी यह हमारे घरों की इस तरह सुरक्षा करते हैं जैसे वह हमारे अपने ही हों। मेरी गली में भी दो कुत्ते हैं, जब भी हमारा कहीं जाना होता है, वह दौड़ते दौड़ते हमारे पास आ जाते हैं और हमें विदाई देते हैं। हम ही क्यों, वे तो पूरी गली के लोगों के साथ समान व्यवहार करते हैं। एक दिन मैंने देखा कि उनमें से एक दरवाजे पर खड़ा है। फिर वह दो पैरों पर बैठ गया। पता नहीं क्या चाहता था। उत्सुकता वश मैंने पूछ लिया "खाना चाहिए, कुछ लाऊं?"। वह तो ठहरा मूक!! क्या कहता। मेरे मन में उसके प्रति संवेदना जागी। मैं अंदर से रोटी लेने गई और उसे दे दी। वह खाकर चला गया। अब वह मेरे घर के बाहर रोज़ सुबह आ जाता और मैं उसे खाना दे देती। दो-तीन दिन बाद दूसरा ...

मेरे चीकू मीकू

Image
   गर्मियों की छुट्टियां चल रही थी, मेरी छोटी बहन मेरे घर आई हुई थी। घर पर खूब चहल-पहल थी। एक दिन शाम को मेरे पति ने घर आकर हम सबको एक सरप्राइज़ दिया। उनके हाथ में एक बड़ा सा पिंजरा था जिसमें दो छोटे प्यारे-प्यारे रुई के फोहे से सफेद खरगोश थे! उन दोनों की लाल-लाल आंखें बहुत ही प्यारी थीं ।वे पिंजरे में से ऐसे झांक रहे थे जैसे अनजाने चेहरों को पहचानने की कोशिश कर रहे हों। मेरे दोनों बच्चों को वे दोनों मेहमान बहुत अच्छे लगे और उन्होंने पिंजरा खोल दिया। दोनों फर्श पर इधर-उधर भागने लगे। मेरे बच्चों ने उन्हें गोद में ले लिया और प्यार करने लगे। उनके आने से घर में रौनक बढ़ गई। वे सबका ध्यान आकर्षित करते थे। अब बात आई कि उनका नामकरण किया जाए। बहुत सारे नाम सोचे गए, कोई उचित नहीं लग रहा था। तब मेरी छोटी बहन ने उन्हें नाम दिया चीकू तथा  मीकू।                         जो थोड़ा बड़ा लग रहा था और शैतान था उसका नाम रखा गया मीकू और दूसरे का चीकू, वे बड़ा ही शांत स्वभाव का था। अब चीकू मीकू हमारे घर के सदस्य की त...