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एकांत, सुख या दुःख

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  कहा गया है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और समूह में रहना पसंद करता है। परंतु एकांत में मोक्ष की प्राप्ति भी उतनी ही सत्य है जितनी की सामाजिकता।                    मन तो हमारा यही करता है कि कोई साथ हो, कोई गुरु, कोई मित्र तथा कोई सहयोगी। एकांत में रहने की हमारी इच्छा नहीं होती। परंतु जब मनुष्य एकांतवास करता है तो उसे धैर्य रखना चाहिए, न कि अवसादों से ग्रसित होकर स्वयं को मृत्यु की ओर ले जाना चाहिए।                                      कई बार मनुष्य के जीवन में ऐसा समय भी आता है जब वह शारीरिक व्याधि या मानसिक तनाव से ग्रसित हो जाता है। ऐसे समय में एकांत ही है इसका समाधान।                                   एकांतवास में मनुष्य को बाह्य सुखों को त्याग कर स्वयं के अंतर्मन में नई उर्जा की अनुभूति करनी चाहिए। एकांत में स्वयं से स्वयं का साक्षात्का...