किट्टू... ओ किट्टू
एक दिन सुबह मैं छत पर एक कोने में खड़ी प्रकृति की छटाएं देख रही थी। ठंडी हवाएं, चिड़ियों का चहचहाना, दूर शांत आकाश में चलते हुए मेघ मेरे एकाकी मन को प्रफुल्लित कर रहे थे। मौसम सुहावना था क्योंकि सावन ने दस्तक दे दी थी। इन सब प्राकृतिक दृश्यों में जैसे मैं खो ही गई थी। मेरे घर के आगे एक नीम का पेड़ है, उसकी शाखाएं मेरी बालकनी तक फैली हुई है। मैं टहलते-टहलते उस पेड़ के पास जाकर खड़ी हो, उसके बेहद कोमल नए पत्तों को निहारने लगी। वे शाखाएं और पत्ते हवा से लहरा कर मेरे पास तक आते मानो कह रहे हो कि वे मेरे समीप रहने से प्रसन्न हैं। अचानक तभी मैंने पेड़ के तने में से किसी जीव को अपनी दो आंखें चमकाते हुए देखा। मुझे यह समझने में देर नहीं लगी कि वह गिलहरी का बच्चा है। वह बाहर नहीं आ रहा था। वह डर रहा था। मैं धीरे-से उसके पास गई तो वह वहां से भाग गया। मैं वही खड़ी अपनी स्मृतियों में खो गई। बचपन में मेरी प्रिय लेखिका महादेवी वर्मा...