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किट्टू... ओ किट्टू

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एक दिन सुबह मैं छत पर एक कोने में खड़ी प्रकृति की छटाएं देख रही थी। ठंडी हवाएं, चिड़ियों का चहचहाना, दूर शांत आकाश में चलते हुए मेघ मेरे एकाकी मन को प्रफुल्लित कर रहे थे। मौसम सुहावना था क्योंकि सावन ने दस्तक दे दी थी। इन सब प्राकृतिक दृश्यों में जैसे मैं खो ही गई थी। मेरे घर के आगे एक नीम का पेड़ है, उसकी शाखाएं मेरी बालकनी तक फैली हुई है। मैं टहलते-टहलते उस पेड़ के पास जाकर खड़ी हो, उसके बेहद कोमल नए पत्तों को निहारने लगी। वे शाखाएं और पत्ते हवा से लहरा कर मेरे पास तक आते मानो कह रहे हो कि वे मेरे समीप रहने से प्रसन्न हैं।                          अचानक तभी मैंने पेड़ के तने में से किसी जीव को अपनी दो आंखें चमकाते हुए देखा। मुझे यह समझने में देर नहीं लगी कि वह गिलहरी का बच्चा है। वह बाहर नहीं आ रहा था। वह डर रहा था। मैं धीरे-से उसके पास गई तो वह वहां से भाग गया।                     मैं वही खड़ी अपनी स्मृतियों में खो गई। बचपन में मेरी प्रिय लेखिका महादेवी वर्मा...

मेरे घर के दो पहरेदार

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 क्या कभी किसी ने बिना वेतन की पहरेदारी करते देखा है? जो कभी किसी से कुछ भी नहीं लेता। मैंने देखा है, वे दो अंजाने से मेरे घर की न जाने कितने दिनों से पहरेदारी कर रहे हैं। और इन्हें आम भाषा में कहा जाता है "स्ट्रीट डॉग"। जिन्हें कोई भाव नहीं देता। जिन्हें खाना देने से भी शान घटती है। जब भी बचा, डाल दिया। और कर दिया उन पर एहसान। बचा कुचा खाकर भी यह हमारे घरों की इस तरह सुरक्षा करते हैं जैसे वह हमारे अपने ही हों। मेरी गली में भी दो कुत्ते हैं, जब भी हमारा कहीं जाना होता है, वह दौड़ते दौड़ते हमारे पास आ जाते हैं और हमें विदाई देते हैं। हम ही क्यों, वे तो पूरी गली के लोगों के साथ समान व्यवहार करते हैं। एक दिन मैंने देखा कि उनमें से एक दरवाजे पर खड़ा है। फिर वह दो पैरों पर बैठ गया। पता नहीं क्या चाहता था। उत्सुकता वश मैंने पूछ लिया "खाना चाहिए, कुछ लाऊं?"। वह तो ठहरा मूक!! क्या कहता। मेरे मन में उसके प्रति संवेदना जागी। मैं अंदर से रोटी लेने गई और उसे दे दी। वह खाकर चला गया। अब वह मेरे घर के बाहर रोज़ सुबह आ जाता और मैं उसे खाना दे देती। दो-तीन दिन बाद दूसरा ...

मेरे चीकू मीकू

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   गर्मियों की छुट्टियां चल रही थी, मेरी छोटी बहन मेरे घर आई हुई थी। घर पर खूब चहल-पहल थी। एक दिन शाम को मेरे पति ने घर आकर हम सबको एक सरप्राइज़ दिया। उनके हाथ में एक बड़ा सा पिंजरा था जिसमें दो छोटे प्यारे-प्यारे रुई के फोहे से सफेद खरगोश थे! उन दोनों की लाल-लाल आंखें बहुत ही प्यारी थीं ।वे पिंजरे में से ऐसे झांक रहे थे जैसे अनजाने चेहरों को पहचानने की कोशिश कर रहे हों। मेरे दोनों बच्चों को वे दोनों मेहमान बहुत अच्छे लगे और उन्होंने पिंजरा खोल दिया। दोनों फर्श पर इधर-उधर भागने लगे। मेरे बच्चों ने उन्हें गोद में ले लिया और प्यार करने लगे। उनके आने से घर में रौनक बढ़ गई। वे सबका ध्यान आकर्षित करते थे। अब बात आई कि उनका नामकरण किया जाए। बहुत सारे नाम सोचे गए, कोई उचित नहीं लग रहा था। तब मेरी छोटी बहन ने उन्हें नाम दिया चीकू तथा  मीकू।                         जो थोड़ा बड़ा लग रहा था और शैतान था उसका नाम रखा गया मीकू और दूसरे का चीकू, वे बड़ा ही शांत स्वभाव का था। अब चीकू मीकू हमारे घर के सदस्य की त...