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एकांत, सुख या दुःख

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  कहा गया है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और समूह में रहना पसंद करता है। परंतु एकांत में मोक्ष की प्राप्ति भी उतनी ही सत्य है जितनी की सामाजिकता।                    मन तो हमारा यही करता है कि कोई साथ हो, कोई गुरु, कोई मित्र तथा कोई सहयोगी। एकांत में रहने की हमारी इच्छा नहीं होती। परंतु जब मनुष्य एकांतवास करता है तो उसे धैर्य रखना चाहिए, न कि अवसादों से ग्रसित होकर स्वयं को मृत्यु की ओर ले जाना चाहिए।                                      कई बार मनुष्य के जीवन में ऐसा समय भी आता है जब वह शारीरिक व्याधि या मानसिक तनाव से ग्रसित हो जाता है। ऐसे समय में एकांत ही है इसका समाधान।                                   एकांतवास में मनुष्य को बाह्य सुखों को त्याग कर स्वयं के अंतर्मन में नई उर्जा की अनुभूति करनी चाहिए। एकांत में स्वयं से स्वयं का साक्षात्का...

निराशा से आशा की ओर

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आज कोरोना काल में संपूर्ण मानवता जैसे निराशा में डूब गई है। लगने लगा है जैसे खुशियों का सूरज डूब सा गया है। चारों ओर निराशा ने अपना घर बना लिया है। निराश जीवन, क्या करें क्या ना करें, समझ में नहीं आता। जीवन-मृत्यु के बीच फंस कर रह गया है मानव। घर के अंदर कैसे समय बिताएं और बाहर कोरोना का पहरा है। जीवन से जुड़े सभी कार्य भी करने आवश्यक है। एक बार रोग लग गया तो पता नहीं बचेंगे भी या नहीं। निराश मन कार्य करे जा रहा था।                             शनै शनै समय बीता और आशा की किरण ने दरवाजे पर दस्तक दी। ज्ञात हुआ कि कोरोना की दवा बनने लगी है और बाज़ार में जल्दी ही आ जाएगी। निराश और हताश मन को कुछ राहत मिली। दावा किया गया कि दवा से सभी स्वस्थ हो सकेंगे। अनायास ही हृदय प्रफुल्लित हो गया। अभी तो दवा पास आई भी नहीं कि मन स्वस्थ हो गया। लगने लगा जैसे यह जीवन फिर से पहले जैसा हो जाएगा। अब हमें भयभीत या निराश नहीं होना चाहिए।                         ...

शब्दों की शक्ति

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आज मैंने शब्दों की शक्ति की महिमा देखी। मैंने देखा दो समूह आपस में बेहद हिंसात्मक तरीके से लड़ रहे थे। अगले ही पल एक संत आत्मा बुजुर्ग वहां आए और उन्होंने कुछ ऐसा कहा कि दोनों समूह शांत हो गए, और आपस में संतुष्ट हो गए। शब्द क्या नहीं कर सकते! शब्दों में बड़ी ताकत होती है। शब्द विचार हैं, शब्द हमारे विचार में हैं। जैसे हमारे विचार होंगे, हमारे शब्द भी वैसे ही होंगे।        बार-बार संकल्पों को लेकर निराशा के भाव से पीड़ित लोग अक्सर कठोर रणनीति अपना लेते हैं। इस कारण वे स्वयं के शत्रु बन जाते हैं, इसे स्वयं के विकास में बाधा उत्पन्न होती है। ऐसे में इस प्रकार की परिस्थितियों से बचने के लिए हमें कठोर बनने के बजाय, शब्दों का प्रयोग कर लचीला बनना सीखें।  सकारात्मक और रचनात्मक नीति हर विपरीत परिस्थितियों को सहज बना कर हमारी राह आसान बना देती है। यह बेहद कारगर नीति है। सकारात्मक शब्दों की ताकत को आज विश्व के कोने-कोने में महसूस किया जा सकता है।               सकारात्मक सोच की रणनीति में यदि लचीले शब्द भी डाल दिए जाएं तो फिर ...