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कोरोना की विदाई

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 एक रात जैसे ही मैं गहरे अचेतन मन में गई मैंने एक विचित्र आकृति वाले नन्हे जीव को मेरे घर की ओर आते देखा। वह भयावह लग रहा था। क्रोध से उसकी आंखें लाल हो रही थीं। वह मेरे समीप आकर खड़ा हो गया। मैंने सहमते हुए उससे पूछा -"कौन हो तुम?" "मैं कोरोना हूँ, मुझे कोविड-19 भी कहते हैं", उसने कहा।  मैंने पूछा "तुम कहां से आए हो?"  उसने कहा "मैं चीन से आया हूं"  "यहां क्यों आए हो?" उसने कहा "मैं सभी मनुष्य को दंड देने आया हूं। इन्होंने प्रकृति को नष्ट किया है।" मैंने कहा "तुम यहां से चले जाओ मुझे डर लग रहा है।"  उसने कहा "अब मैं तुम्हारे घर रहना चाहता हूं"  "नहीं तुम मेरे घर नहीं रह सकते!" मैंने कहा ।                     मेरे चारों ओर अंधेरा था। रात का सन्नाटा फैल रहा था।  घबराहट के कारण मैं पसीने से तरबतर थी। उस कोरोना नाम के विचित्र जीव से बचने के लिए सहायता के लिए इधर-उधर देखने लगी। आज मैं बड़े संकट में फंसी थी। मैं किसी भी प्रकार से उस जीव को अपने घर नहीं आने देना चाहती थी। सहमते हुए मैं पीछे ...

एक साल ऐसा भी...2020

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कभी सोचा ना था कि ऐसा होगा। कौन जाने किसकी बद्दुआ लगी होगी। जीना मुश्किल हो गया है। देखते ही देखते सब कुछ बदल गया। मानो पूरी दुनिया में कहर सा छा गया है। जीवन रुक सा गया है। समय है कि बीत ही नहीं रहा। संसार में उथल-पुथल सी मच गई है। प्राणों पर संकट सा छा गया है। हम मनुष्यों का केवल एक ही शत्रु है जिसने प्रत्येक के जीवन में तूफ़ान सा ला दिया है, वह है कोरोना।                इस नाम को सुनते ही एक दृष्टि में पूरा ब्रह्मांड गोल-गोल घूमने लगता है। क्षण भर में ह्रदय विदीर्ण कर देने वाले दृश्य सामने आ जाते हैं। जिसकी कल्पना मात्र से ही हृदय गति बढ़ जाती है। अस्पतालों में जगह नहीं है मरीजों को रखने की। चारों ओर शव ही शव है। मृत्यु तो जैसे एक अंक मात्र रह गई है। बस प्रत्येक बार गिनती बढ़ जाती है। अब कोई यह पता करने वाला भी नहीं कि किसकी मृत्यु हुई है, उसे अंतिम संस्कार कैसे देना है। अंतिम संस्कार की तो जैसे धज्जियां उड़ गईं हैं। अब ना कोई जाति है ना संस्कार! केवल एक गिनती।               वर्ष 2020 तुम कब जाओगे!...