कोरोना की विदाई

 एक रात जैसे ही मैं गहरे अचेतन मन में गई मैंने एक विचित्र आकृति वाले नन्हे जीव को मेरे घर की ओर आते देखा। वह भयावह लग रहा था। क्रोध से उसकी आंखें लाल हो रही थीं। वह मेरे समीप आकर खड़ा हो गया। मैंने सहमते हुए उससे पूछा -"कौन हो तुम?"
"मैं कोरोना हूँ, मुझे कोविड-19 भी कहते हैं", उसने कहा।
 मैंने पूछा "तुम कहां से आए हो?" 
उसने कहा "मैं चीन से आया हूं"
 "यहां क्यों आए हो?"
उसने कहा "मैं सभी मनुष्य को दंड देने आया हूं। इन्होंने प्रकृति को नष्ट किया है।"
मैंने कहा "तुम यहां से चले जाओ मुझे डर लग रहा है।"
 उसने कहा "अब मैं तुम्हारे घर रहना चाहता हूं"
 "नहीं तुम मेरे घर नहीं रह सकते!" मैंने कहा ।
                    मेरे चारों ओर अंधेरा था। रात का सन्नाटा फैल रहा था।  घबराहट के कारण मैं पसीने से तरबतर थी। उस कोरोना नाम के विचित्र जीव से बचने के लिए सहायता के लिए इधर-उधर देखने लगी। आज मैं बड़े संकट में फंसी थी। मैं किसी भी प्रकार से उस जीव को अपने घर नहीं आने देना चाहती थी। सहमते हुए मैं पीछे के दरवाजे से अपने छोटे बगीचे की ओर गई। मेरे बगीचे में अदरक, लहसुन, तुलसी, गिलोय, अश्वगंधा, हल्दी, लौंग, काली मिर्च और दालचीनी के पौधे थे। वहां ठंडी हवा चल रही थी। और ये सभी दिव्य औषधियां आपस में बात कर रही थी!! और बड़ी ही प्रसन्न थी! मेरे आश्चर्य की सीमा न रही। मैंने तो कभी ऐसा नहीं देखा था! उन सभी औषधियों की महक से सारा वातावरण सुगंध से भरा था। लग रहा था मानो एक विशेष संगीत गूंज रहा हो। उन्होंने मुझसे पूछा "तुम क्यों परेशान हो?"
 मैंने कहा "मेरे घर एक भयावह विचित्र प्राणी आ रहा है, मैं उसे आने नहीं देना चाहती। जिसके कारण मैं भय से ग्रसित हूं।"
 उन्होंने मुझसे कहा "तुम चिंता मत करो। हम सब मिलकर तुम्हारी समस्या सुलझाएंगे। हम तुम्हारे घर के सदस्य जैसे ही मिलकर सामना करेंगे।"
 मैंने पूछा "कैसे करोगे इतने शक्तिशाली जीव का सामना? तुम नहीं जानते वह इतना शक्तिशाली है कि संसार के कई शक्तिशाली देश जैसे अमेरिका, इंग्लैंड, इटली, फ्रांस, स्पेन आदि में तबाही मचा चुका है, कोई उसे हरा नहीं पाया। फिर हम क्या है उसके सामने।"
 उन दिव्य औषधियों ने कहा "तुम नहीं जानतीं कि हम कितनी शक्तिशाली हैं। हम मृत्यु शैया पर पड़े प्राणी में भी जान डाल देते हैं। हम 'आयुर्वेद' हैं। जो विश्व की सबसे प्रथम चिकित्सा पद्धति है जिसे संसार ने महत्ता नहीं दी। चलो सब साथ चलते हैं।"
 हम सब चुपचाप धीरे-धीरे पीछे के दरवाजे से उस जीव के सामने आ गए। फिर पूरी शक्ति से मेरी दिव्य औषधियों ने उस विचित्र कष्टदाई प्राणी पर एक-एक करके अनेकों प्रहार किए। जिससे वह चिल्ला चिल्ला कर भागे जा रहा था। और मैंने कहा "जाओ कोरोना तुम्हे जाना ही पड़ेगा!"
           अचानक से मेरे अलार्म की घंटी मेरे कानों में सुनाई पड़ने लगी और मेरी नींद टूट गई। ओह! तो यह स्वप्न था!
 चलो स्वप्न में ही सही कोरोना की विदाई एक लंबी राहत दे रही थी।

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