गरीबी का दर्द

सर्द जाड़े की रात का मौसम ऊपर से अमावस्या का घुप अंधेरा! इतनी भयानक ठंडी रात में रामदीन और चंदो अपने खेत में पानी देने जा रहे थे। एक पुरानी छोटी-सी लालटेन लेकर रामदीन आगे-आगे जा रहा था और चंदो उसके पीछे। बस एक हाथ भर ही दिखा पा रही थी लालटेन। न आगे कुछ दिखाई देता न पीछे। ले देकर यही एक छोटा-सा ज़मीन का टुकड़ा बचा था रामदीन के पास। बाकी तो उसके पिता ने शराब में उड़ा दिया। दिन रात मेहनत करते तब जाकर गा पाते वे पेट भर अनाज। रही सही कसर निकाल देता भगवान। सूखी चिलचिलाती गर्मी हो तो बारिश में कटौती और ज्यादा ठंड हो तो बर्फ सी गिरा देता। खेतों पर छोटे नन्हे पौधे मुश्किल से ही इतनी ठंड में जी पाते। कुछ मर भी जाते। बस जैसे तैसे ही गुज़र रही थी जिंदगी दोनों की। जब वे दोनों खेत पर पहुंचे, रामदीन ने फावड़ा उठाया और पानी छोटी-छोटी क्यारियों में काटने लगा। चंदो मेढ़ बनाती जा रही थी। इतनी सर्दी में दोनों के तन पर कपड़े नाम मात्र थे। एक पतला, कमजोर और न जाने कितना पुराना कंबल रामदीन ने ओढ़ रखा था। कंबल के झरोखों में से सर्द हवाएं उसके शरीर में अंदर तक तलवारे सी काट देती थी। चंदू के पास केवल एक शॉल, जो घिसकर छलनी बनी हुई थी, उसे पहनो या ना पहनो बराबर। सर्द रात के ठंडे पानी में उन दोनों के पैर जैसे पत्थर बन गए थे। अचानक उसकी नज़र पत्नी चंदो के पैर पर पड़ी जिस पर जोंक चिपक गई थी। वह जोर से चिल्लाया-  "चंदो! तेरे पैर पर जोंक है!"
 चंदो बोली - "कौन से पैर पर.." इतने में रामदीन लालटेन लेकर पास आया और एक झटके में पैर से जोंक छुटा दी। रामदीन बस एकटक चंदो को देख रहा था। और सोच रहा था कि हम छोटे गरीब किसानों के दर्द का भी एहसास खत्म हो गया है। गरीबी ने हमारे शरीर पत्थर कर दिए हैं।

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