सावन का सोमवार
सावन का पहला सोमवार आया। वेदिका के मन में शिव मंदिर जाने की इच्छा जागी। उत्सुकता वश जल्दी-जल्दी सुबह उठकर उसने घर का सारा काम निपटाया। नहा-धोकर पीली साड़ी पहनी। अपनी पूजा की डलिया तैयार की और भोलेनाथ पर जल चढ़ाने के लिए भी दूध, दही, शहद और पानी से पंचामृत तैयार किया। कुछ बेल के पत्ते तोड़े। भांग और शमी के पत्ते भी ले लिए साथ में। बहुत खुश थी वेदिका कि आज अपने इष्टदेव की पूजा करके आएगी। सावन के सोमवार में मंदिर जाकर शिव की आराधना का विशेष महत्व है। यह शिव का पवित्र महीना है। अपने इष्टदेव का ध्यान करते वह मंदिर पहुंची। उसने देखा कि मंदिर के मुख्य द्वार पर ताला लगा हुआ था। द्वार पर एक पात्र रखा था जल चढ़ाने के लिए। पंडित जी कह रहे थे सभी को एक-एक करके इसी पात्र में जल चढ़ाना है। और सभी भक्तों से निवेदन है कि वह उचित दूरी बनाकर रखें। किसी भी दीवार व वस्तु को हाथ न लगाएं।
यह देखकर वेदिका निराश हो गई। जिस इष्टदेव का दर्शन करने व जल अर्पित करने आई थी, वह सब तो दूर की बात हो गई। ऐसा वह सोच ही रही थी कि किसी ने लाइन में से कहा "मन में भगवान स्थापित हो जाए तो घर पर भी मंदिर जैसी पूजा हो सकती है।"
सुनते ही वेदिका घर पर आई और अपने घर के मंदिर में शिव जी का जलाभिषेक करा कर पूजा अर्चना की। अब उसे शिव मंदिर जैसी आत्म संतुष्टि एवं सुख की अनुभूति हो रही थी।
Comments
Post a Comment