शहीद की राखी


बगीचे में विदिशा गुमसुम बैठी थी। चेहरे पर मायूसी, आंखों में से झर-झर बहते आंसू, उसका हाल-ए-दिल बयां कर रहे थे। बैठे-बैठे वह अपने मर्मस्पर्शी स्मृतियों में खो गई। आज राखी के दिन भैया की बहुत याद आ रही थी। 
                      देश के बॉर्डर से सटा हुआ गांव है उसका। पापा रिटायर्ड कर्नल थे। बचपन में दोनों भाई-बहन बड़े मेधावी छात्र थे। सच्चे देशभक्त थे दोनों। देशभक्ति के कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया करते थे। बहन भाई मैं बहुत प्यार था। विदिशा छोटी और लाडली थी। और हमेशा कहती थी कि भैया मैं रक्षाबंधन पर मनपसंद उपहार लूंगी।
" हां हां ज़रूर। तेरे लिए ही तो है सब कुछ।" भैया हंसकर कह देता।
                        विदिशा की तंद्रा टूटी और सोचने लगी कि आज राखी के दिन मैं किसको राखी बांधूंगी। इकलौता प्यारा भाई था उसका। कितनी शान से कहा था "विदिशा, तेरा भाई अब केवल विश्वजीत नहीं, लेफ्टिनेंट विश्वजीत बन गया है!"
   अपनी मातृभूमि पर मर मिटने की कसम खाई थी उसने। अपने देश के लिए कुछ करना चाहता था। देशभक्ति कूट-कूट कर भरी थी उसमें। पर आज उसका भाई उसके पास नहीं था। देश के लिए जान न्योछावर कर चुका था। विदिशा की आंखों से आंसू टप-से गिर पड़े। पुलवामा हमले में शहीद हो गया था उसका प्यारा विशु भैया। उसे अपने भाई पर गर्व है।
 "विदिशा, उठो। तुम्हें कहीं जाना है मेरे साथ।"  विदिशा के पापा ने कहा।
" ठीक है, पापा।"  विदिशा ने बुझे मन से कहा और साथ चल दी।
 "अरे ऐसे ही चल दी!? राखी का थाल तो सजाओ और देखो थाल में ढेर सारी राखियां रखना। बॉर्डर पर बहुत सारे भाई तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं।" 
               उन सभी फौजी भाइयों को राखी बांधकर विदिशा को मानो अपने विशु भैया जीवित प्रतीत होने लगे।

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