दद्दू की जनमाष्टमी

"दद्दू आज कान्हा जी का बर्थडे है ना! आज तो मैं खूब सारी मिठाइयां खाऊंगी, आप भी खाओगे ना" दस साल की निम्मी ने दद्दू की ओर मुस्कुरा कर बोला।
"नहीं गुड़िया! मैं नहीं खा सकता। मुझे डॉक्टर ने मना किया है" उदास मन से रामेश्वर जी अपनी पोती से बोले।
                        बचपन से ही रामेश्वर जी को मिठाइयां, मक्खन-मिश्री खाने का शौक था। गली मोहल्ले के सभी लोग उन्हें बाल गोपाल कहा करते थे। मीठा खा खाकर उनकी तोंद निकल आई थी। पत्नी सरला हंसकर चिढ़ाया करती थी "तोंद निकल कर बाहर आ गई है, पूरे सेठ लगते हो, अब तो मीठा खाना छोड़ दो।"
पर रामेश्वर जी किसी की कहां सुनते, खाना कम और मीठा ज्यादा होता था उनका। 
शुगर लेवल बढ़ जाने से डॉक्टर ने मीठा खाने को सख्त मना किया था। 
                    आज उनके प्रिय त्योहार 'जन्माष्टमी' पर वह खुश रहने का केवल दिखावा कर रहे थे। पर मन ही मन उदास थे। बचपन में दही-हांडी फोड़ना, माखन-मिश्री खाना, तरह-तरह के मीठे पकवान खाना, रह-रहकर उनको याद आ रहे थे।
                            शाम को बाल गोपाल की पूजा के लिए सारा परिवार एकत्रित हुआ। प्यारे लड्डू गोपाल के भोग  के लिए माखन, मिश्री, लड्डू तथा अन्य मिठाईयाँ रखी गईं। पूजा संपन्न होने के बाद प्रसाद बांटा गया। प्रसाद बांट रहीं थी उनकी पत्नी सरला जी। रामेश्वर जी ने भी हाथ आगे बढ़ाया। प्रसाद में मिला केवल थोड़ा सा माखन। 
"बस इससे ज्यादा नहीं मिलेगा आपको जी" पत्नी जी ने मुंह बिचकाते हुए कहा।
                     
                      रामेश्वर जी चुपचाप माखन और कान्हा को देख ही रहे थे कि अचानक से निम्मी दौड़ी दौड़ी आई और बोली "लो दद्दू! आपके लिए कुछ मिठाइयां छिपाकर ले आई हूं! आज जन्माष्टमी पर बिना मीठा खाए क्यों रहोगे? आप भी तो बचपन में बाल गोपाल थे।"

Comments

Popular posts from this blog

अगर पिज़्ज़ा बर्गर बोलते...

निराशा से आशा की ओर

पहाड़ाँ वाली मां