सच्चे मित्र की मित्रता


विनीशा अपने बगीचे में चुपचाप गहरी सोच में डूबी हुई थी। अपने आठ साल के बेटे पार्थ को सच्ची मित्रता नहीं समझा पा रही थी। पार्थ ने उससे पूछा था “मम्मा, दोस्त को कैसे पता चल जाता है कि उसके दोस्त को क्या चाहिए?” विनीशा निरुत्तर थी। सोच रही थी कि कैसे बताऊं। इतने में अचानक से एक पत्ता उड़ता हुआ मिट्टी के ढेले के पास आ पहुंचा। हल्की-हल्की हवा चल रही थी। लग रहा था कि दोनों खुश है। कभी पता आगे बढ़ जाता हवा से, तो कभी छोटा सा ढेला आगे लुढ़क जाता। लग रहा था मानो वे दोनों पकड़म-पकड़ाई खेल रहे हों। इतने में पार्थ वहां आ पहुंचा और बोला “क्या देख रही हो मम्मा?”

“बेटा, मैं यह पत्ता और मिट्टी के ढेले को देख रही हूं” विनीशा ने मुस्कुराते हुए कहा।

“मम्मा क्या यह दोनों दोस्त बन गए हैं?” पार्थ ने उत्सुकतावश पूछा।

“हां” विनीशा ने कहा।

इतने में हवा की गति बढ़ गई और उसने छोटी आंधी का रूप ले लिया। विनीशा और पार्थ तेज हवा से बचते हुए एक पेड़ के नीचे खड़े हो, देखने लगे कि वह पता और मिट्टी का ढेला कहां गया। क्या पत्ता उड़ गया होगा? तभी पार्थ आश्चर्य से बोला “मम्मा, वह देखो पत्ते के ऊपर मिट्टी का ढेला आकर बैठ गया! अब पता उससे दूर नहीं जाएगा!”

विनीशा ने सिर हाँ में हिलाया।

“मम्मा! मम्मा! बारिश आने लगी चलो घर के अंदर चलते हैं”

“ठीक है” विनीशा ने कहा।

विनीशा ने चलते चलते देखा तो उसके आश्चर्य की सीमा न रही। बारिश शुरू होने पर पत्ता पूरी तरह से ढेले को ढके हुए था, जिससे ढेले पर बारिश की बूंदे ना पड़े। ढेले का तो अस्तित्व ही समाप्त हो जाता। विनीशा ने पार्थ को दिखाया तो पार्थ बोला “मम्मा क्या ऐसे होते हैं सच्चे दोस्त कि जिनको बिना बताए ही पता चल जाता है कि दोस्त को क्या जरूरत है।”

विनीशा मुस्कुरा रही थी कि उसने अपने बेटे को सच्ची मित्रता सिखा दी थी।

--गीता सिंह 

 उत्तर प्रदेश 

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