प्रथम शिक्षिका मां
प्रथम शिक्षिका मां ही होती,
हाथ पकड़ कर, मुझे चलाती।
और सत्य की ,राह दिखाती,
अच्छे बुरे का ,ज्ञान कराती।
क्या करना है ,क्या नहीं करना,
यह सब ,अच्छे से समझाती ।
क्या खाना है ,क्या नहीं खाना,
यह भी, मुझे बताती जाती।
मां का कर्ज कोई, उतार न पाया,
सबसे ऊपर मां ही होती।
सर पर हाथ हो ,मां का मुझ पर,
पूरी दुनिया जीती लगती।
-- गीता सिंह
उत्तर प्रदेश
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