मेरे चीकू मीकू

 

 गर्मियों की छुट्टियां चल रही थी, मेरी छोटी बहन मेरे घर आई हुई थी। घर पर खूब चहल-पहल थी।
एक दिन शाम को मेरे पति ने घर आकर हम सबको एक सरप्राइज़ दिया। उनके हाथ में एक बड़ा सा पिंजरा था जिसमें दो छोटे प्यारे-प्यारे रुई के फोहे से सफेद खरगोश थे! उन दोनों की लाल-लाल आंखें बहुत ही प्यारी थीं ।वे पिंजरे में से ऐसे झांक रहे थे जैसे अनजाने चेहरों को पहचानने की कोशिश कर रहे हों। मेरे दोनों बच्चों को वे दोनों मेहमान बहुत अच्छे लगे और उन्होंने पिंजरा खोल दिया। दोनों फर्श पर इधर-उधर भागने लगे। मेरे बच्चों ने उन्हें गोद में ले लिया और प्यार करने लगे। उनके आने से घर में रौनक बढ़ गई। वे सबका ध्यान आकर्षित करते थे। अब बात आई कि उनका नामकरण किया जाए। बहुत सारे नाम सोचे गए, कोई उचित नहीं लग रहा था। तब मेरी छोटी बहन ने उन्हें नाम दिया चीकू तथा मीकू।

                        जो थोड़ा बड़ा लग रहा था और शैतान था उसका नाम रखा गया मीकू और दूसरे का चीकू, वे बड़ा ही शांत स्वभाव का था। अब चीकू मीकू हमारे घर के सदस्य की तरह रहने लगे। मेरा बेटा, जो उस समय 5 वर्ष का था, वे जो भी चीज़ खाता चीकू मीकू को भी खिलाता। मेरी बेटी बड़ी थी वह दोनों को गोद में ले लेकर खेलती थी। मेरे दोनों बच्चे उन दोनों से बहुत खुश थे। हमने उनका पिंजरा सीढ़ियों के नीचे रख दिया, जिससे वे हमें आते जाते देख सकें। उन्हें कुछ खिलाएं बिना मेरा दिन भी शुरू नहीं होता था। जब भी मैं सीढ़ियों से नीचे जाती, वे दोनों अपने पंजों पर खड़े होकर पिंजरे में से ऐसे झाँकते कि जैसे कह रहे हों कि हमें पिंजरे में नहीं रहना, हमें आप सब के साथ खेलना है।                                     मैं उन्हें गाजर तथा अन्य सब्जियां देती तो वे झटपट खा जाते। मूली, पालक के पत्ते तो वे एक-एक को हाथों में पकड़कर खाते थे। बड़ा खरगोश काफी तेज़ था। वह बहुत फुर्तीला था। जितने में चीकू खा रहा होता था तभी मीकू झपट्टा मारकर उसके पंजो से ले लेता। तब मैं दोनों को अलग-अलग करके खिलाती थी। जब नहलाने का समय आता था तब भी बड़ा, घर के बरामदे में दौड़ जाता। मेरे दोनों बच्चे नहलाने में मेरी मदद करते थे, और एक-एक करके गोद में लेकर मैं उन्हें नहला देेती। और फिर थोड़ी देर के लिए चारपाई पर हल्की धूप में उन्हें बिठा देती। मेरा बेटा उनके पास बैठकर खेलता था। पड़ोसियों के रिश्तेदार जब भी अपनी नानी के यहां आते, तो वह हमारे चीकू मीकू के साथ जरूर खेलने आते। कभी-कभी मीकू अपना छोटा-सा हाथ मेरे हाथ पर रख देता, अपनी लाल आंखों से ऐसे देखता जैसे मुझे जानता हो। जब मैं सुलाने के लिए उस पर चादर ढक देती तो बच्चों की तरह चादर हटाकर झांकने लगता।

                          महीनों गुजर गए। हम सब उन खरगोशों के साथ बहुत खुश थे। हम सभी को उनकी आदत सी हो गई थी। रात को हम उन्हें पिंजरे में बंद कर दिया करते थे। अचानक पता चला कि मीकू पिंजरे का दरवाजा खोल देता है और बाहर चला जाता है। मुझे बड़ी हैरानी हुई कि वह दरवाजा कैसे खोल सकता है! मीकू बड़ा शैतान हो गया! वह कई बार घर के बाहर चला जाता था। मेरे बच्चे उसे पकड़कर लाते थे। मीकू इसे अब खेल समझने लगा। एक शाम जब हमने चीकू मीकू को पिंजरे में बंद किया तो मैं चुपचाप उसे देखने लगी। थोड़ी ही देर में मीकू दरवाज़ा हिलाने लगा, जिससे दरवाजे की कुंडी ढीली पड़ गई और दरवाजा खुल गया। मीकू बाहर!! मैं तो दंग रह गई! फिर मैंने उस शैतान को पकड़ा और पिंजरे में बंद करके, कुंडी टाइट करके लगा दी। मैंने सोचा सुबह को पिंजरे के दरवाजे को ज़्यादा टाइट करवा दूंगी। सुबह हुई, मैं उठी और चीकू मीकू को खाने के लिए उनके प्यारे हरे पत्ते देने गई। मैं देख कर चौंक गई कि पिंजरे में केवल चीकू था! मैंने गेट से बाहर देखा तो कुत्ते भौंक रहे थे और हमारा मीकू घायल पड़ा था। मैं दौड़ी-दौड़ी उसके पास गई उसे गोद में उठाया और ऊपर ले आई। बच्चों ने जल्दी-जल्दी पानी पिलाया। उसके घावों पर मरहम लगाया। हम उसे डॉक्टर के ले जाने ही वाले थे कि उसने दम तोड़ दिया। मुझे बहुत रोना आया। मेरा बेटा रोए ही जा रहा था। मेरी बेटी उसे ले जाने ही नहीं दे रही थी।  मीकू घर की शान था। अब वह हमारे बीच नहीं था। हम सब उदास थे कि अचानक ध्यान आया कि चीकू को कैसा लग रहा होगा! फिर उसने कई दिनों तक कुछ नहीं खाया। वह अकेला नहीं रह पा रहा था। फिर मेरे पति चीकू को वहीं छोड़ आए जहां से वह आया था। कम से कम वह वहां और खरगोशों के साथ मिलकर तो रहेगा। इस घटना को कई साल बीत गए लेकिन मैं मेरे बच्चे आज भी चीकू मीकू को बहुत याद करते हैं। उनकी यादें हमारे बीच आज भी मौजूद हैं और हमारे चीकू मीकू हमेशा हमारे दिलों में रहेंगे।

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