एक साल ऐसा भी...2020

कभी सोचा ना था कि ऐसा होगा। कौन जाने किसकी बद्दुआ लगी होगी। जीना मुश्किल हो गया है। देखते ही देखते सब कुछ बदल गया। मानो पूरी दुनिया में कहर सा छा गया है। जीवन रुक सा गया है। समय है कि बीत ही नहीं रहा। संसार में उथल-पुथल सी मच गई है। प्राणों पर संकट सा छा गया है। हम मनुष्यों का केवल एक ही शत्रु है जिसने प्रत्येक के जीवन में तूफ़ान सा ला दिया है, वह है कोरोना।
               इस नाम को सुनते ही एक दृष्टि में पूरा ब्रह्मांड गोल-गोल घूमने लगता है। क्षण भर में ह्रदय विदीर्ण कर देने वाले दृश्य सामने आ जाते हैं। जिसकी कल्पना मात्र से ही हृदय गति बढ़ जाती है। अस्पतालों में जगह नहीं है मरीजों को रखने की। चारों ओर शव ही शव है। मृत्यु तो जैसे एक अंक मात्र रह गई है। बस प्रत्येक बार गिनती बढ़ जाती है। अब कोई यह पता करने वाला भी नहीं कि किसकी मृत्यु हुई है, उसे अंतिम संस्कार कैसे देना है। अंतिम संस्कार की तो जैसे धज्जियां उड़ गईं हैं। अब ना कोई जाति है ना संस्कार! केवल एक गिनती।
              वर्ष 2020 तुम कब जाओगे! तुमने तो सब कुछ ही परिवर्तित कर दिया है। तुमसे कोई प्रसन्न नहीं है। कृपया तुम जल्दी जाओ जिससे नया सवेरा हो सके। 
                   पहले सब कुछ सामान्य सा चल रहा था। ना जाने यह कष्टदाई 2020 कब आ गया और अपने साथ लाया एक विषाणु। ऐसा वर्ष ना पहले कभी हुआ और ना कभी होगा।
             यह वह वर्ष है जिसकी गर्मियों में हमने कुल्फी, गन्ने के रस के बजाए काढ़ा पिया है। शीतल पेय तो जैसे हम भूल ही गए। गली नुक्कड़ के चाट-गोलगप्पे... सभी को हमसे दूर कर दिया इस वर्ष ने‌‌‌। शादी समारोह में जाना अब बीते दिनों की बात हो गई। एक अलग सी दुनिया बन गई है। एकांत सा अनुभव होता है। प्रसन्न रहने का प्रयास कर लो परंतु निराशा आ ही जाती है मन में। समय ने कैसे धूल चटाई है मानव को! तब क्या था अब क्या है। आज मनुष्य को मृत्यु से ज्यादा एकाकी रहने का डर सता रहा है। "हे प्रभु तेरी माया अपरंपार है!"। इस बीमारी ने सब को अकेला कर दिया है। जिसको रोग लगा है उसको भी, और जो उसके साथ में है उसको भी। यह वर्ष आपातकाल घोषित हो जाएगा। समुद्रों में अनेक प्रकार के तूफान, भूकंप, बाढ़ भूमि-क्षरण आदि ने मानो पूरी धरती पर विपत्ति ला दी है। प्रकृति निष्ठुर हो गई है। मनुष्य ने प्रकृति से छेड़छाड़ करके सही नहीं किया। लग रहा है कि जैसे प्रकृति अपना बदला कोरोना के रूप में ले रही हो!
                                 प्रकृति तेरे आगे आज भी मानव नतमस्तक है। समय हमें सिखा रहा है कि जो जीवन शैली हम अब तक अपना रहे थे वह सही नहीं थी। हमने अपना जीवन स्वयं ही संकट में डाल दिया है। मानव शरीर शाकाहार से मांसाहार की ओर ढाल दिया है। इस अंधाधुंध भागमभाग जिंदगी में मानव यह भूल गया कि ''प्रकृति तेरे वश में नहीं है", प्रकृति तो सर्वशक्तिमान है। उसका संतुलन बिगाड़ोगे तो स्वयं संतुलन बना लेगी। इस समय वही सुखी है जिसका मस्तिष्क शांत है, संतुलित है, जिसमें योग है, उच्च विचार है, जो परोपकारी है। यह धन-वैभव किसी काम के नहीं हैं कोरोना के सामने। प्रतीत होता है कि मनुष्य की कारगुजारी देखते हुए ईश्वर ने कोरोना नाम का विशेष शक्ति वाला शत्रु भेज दिया है संसार में, जो बिना खाए भी कई-कई दिनों तक रह सकता है। जो चुपके से मनुष्य के भीतर कब प्रवेश कर जाए पता भी नहीं चलता। यह शत्रु इतना प्रबल है कि सारा विश्व इस सबसे सूक्ष्म विषाणु के सामने कुछ भी नहीं है।
                          परंतु "सब दिन होत न एक समान"।।  जब अच्छा समय नहीं टिकता तो बुरा भी नहीं रहेगा। यह कष्टकारी समय भी जाएगा। हिम्मत और विश्वास रखें। कभी तो काले बादल छटेंगे और धूप निकलेगी। सब कुछ पहले जैसा होगा। मनोहारी, सुखकारी और लाभकारी।।

Comments

  1. Nicely written
    But it's true
    Happy days are coming soon
    Have patience
    Om Shanti

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  2. It's true.
    &
    Thank you 4 writing this, please keep going your articles.

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