किट्टू... ओ किट्टू

एक दिन सुबह मैं छत पर एक कोने में खड़ी प्रकृति की छटाएं देख रही थी। ठंडी हवाएं, चिड़ियों का चहचहाना, दूर शांत आकाश में चलते हुए मेघ मेरे एकाकी मन को प्रफुल्लित कर रहे थे। मौसम सुहावना था क्योंकि सावन ने दस्तक दे दी थी। इन सब प्राकृतिक दृश्यों में जैसे मैं खो ही गई थी। मेरे घर के आगे एक नीम का पेड़ है, उसकी शाखाएं मेरी बालकनी तक फैली हुई है। मैं टहलते-टहलते उस पेड़ के पास जाकर खड़ी हो, उसके बेहद कोमल नए पत्तों को निहारने लगी। वे शाखाएं और पत्ते हवा से लहरा कर मेरे पास तक आते मानो कह रहे हो कि वे मेरे समीप रहने से प्रसन्न हैं।
                         अचानक तभी मैंने पेड़ के तने में से किसी जीव को अपनी दो आंखें चमकाते हुए देखा। मुझे यह समझने में देर नहीं लगी कि वह गिलहरी का बच्चा है। वह बाहर नहीं आ रहा था। वह डर रहा था। मैं धीरे-से उसके पास गई तो वह वहां से भाग गया।
                    मैं वही खड़ी अपनी स्मृतियों में खो गई। बचपन में मेरी प्रिय लेखिका महादेवी वर्मा जी के 'गिल्लू' नामक पाठ को मैंने कितनी बार चाव से पढ़ा, स्वयं मुझे भी नहीं याद। पढ़े तो मैंने और भी पाठ थे मेरी प्रिय लेखिका के, परंतु गिल्लू ने मेरे हृदयपटल पर एक अमिट छाप छोड़ी थी। मैं आज भी गिल्लू को नहीं भूली हूं।
                         और आज यह मुझे उसी नन्हे गिल्लू का स्मरण करा रहा था। मैंने उसे नया नाम दिया, किट्टू। अब मैंने उसे आवाज लगानी शुरू कर दी। वह नहीं आया। मैं जाकर थोड़े गेहूं के दाने लेकर आ गई और एक ओर जमीन पर रख दिए। मैं छुप कर यह दृश्य देखने लगी। थोड़ी देर में वह पेड़ से नीचे उतरा और गेहूं के दाने की ओर बढ़ा। मैंने देखा वह भूरे रंग का जीव विशेष आकर्षक एवं कोमल था। उसकी बड़ी-बड़ी आंखें नीले कंचे के समान थीं। खड़े सुंदर कान उसके चौकन्ना रहने का परिचय दे रहे थे। उसकी पतली लंबी रोंयेदार कमर पर गहरे रंग की धारियां उसकी सुंदरता में चार चांद लगा रही थीं। उसकी लंबी कोमल धब्बेदार पूछ उसे साधारण से विशेष बना रही थी। वह दोनों हाथों से गेहूं के दानों को अपनी अंजुली में भरकर एक बालक की तरह से खाने लगा। बीच-बीच में अपनी चंचल आंखों से इधर-उधर देख लेता। यह दृश्य देखकर मैं आश्चर्यचकित रह गई। वह इतनी सावधानी से एक-एक दाना अंजुली से लेता कि कोई दाना नीचे ना गिरे। एक बार मन में विचार आया कि एक पिंजरा ले आऊं और इसे अपने पास रख लूं। फिर सोचा - नहीं, मैं इस पिंजरे में कैद नहीं करूंगी। इससे इसकी स्वतंत्रता समाप्त हो जाएगी। हम आज के स्वतंत्र भारत में हैं फिर इसे परतंत्र क्यों रखूं। यही सोच कर मैंने आवाज लगाई किट्टू...ओ किट्टू। उसने मेरी ओर ऐसे देखा जैसे वह अपना नाम पहचान गया हो। और झट से नीम के पेड़ पर चढ़ गया। तब से मैं प्रतिदिन सुबह उसके लिए कई प्रकार के अनाज डालती हूं। और वह सदैव आ कर खा जाता है। लगता है जैसे वह मुझे पहचानने लगा है- किट्टू...मेरा प्रिय किट्टू।

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