निरोग की राह... योग

"ज़रा मेरे दर्द की दवा देना।" 
"अभी लाया दादी!"
" हाय मेरी कमर..." कहते-कहते दादी धम्म से पलंग पर बैठ गईं। और सोचने लगी "इन मरी सीढ़ियों ने तो मेरी जान ही निकाल दी"।
 "दादी मैंने कितनी बार कहा है कि आप योगा करो लेकिन आप मानती ही नहीं" मुंह बनाकर कहा उस दस साल की बच्चे ने।
 साठ की उम्र में दादी अस्सी की लगने लगी थीं। ऊपर से शाही दावतों का सा खाना। कौन सा रोग था जो ना लगा था। पर मजाल क्या जो उनसे कोई परहेज़ करवा सके!
      एक-एक करके सब को डांटती थीं। बहुएं तो सिर झुकाए बस सुनती थीं। आवाज़ ऐसी कड़कती कि राह चलता सुने तो डर जाए। बैठे-बैठे शरीर फैलता जा रहा था। पूरी सेठानी लगती थीं। और अब तो यह हालत थी कि एक बार भी सीढियां चल लेतीं तो सांस ऐसी फूलती की जान निकल जाएगी। पढ़ी-लिखी और शान और शौकत वाली दादी योग तथा आयुर्वेद में विश्वास नहीं करती थीं। मायके से ससुराल तक कई-कई नौकर रहते थे दादी के।
       लेकिन आज कोरोना काल में साठ से अधिक उम्र और बीमार लोगों को घर से निकलने की मनाही थी। बिट्टू के स्कूल में सिखाया गया था कि योग करने से बीमारी नहीं आती। फिर फोन और टीवी पर भी लगातार संदेश आ रहे थे कि काढ़ा पिए और इम्युनिटी बढ़ाएं। बिट्टू बड़ा समझदार बच्चा था। उसने अपनी मां से कह कर काढ़ा बनवाया और दादी के पास जाकर बोला "लो दादी, यह काढ़ा पी लो। इससे आप बीमार नहीं पड़ोगी।" 
"इतनी तरक्की कर ली है विज्ञान ने, आज हर बीमारी की दवा है एलोपैथी में। और तू काढ़ा लाया है। मैं नहीं पियूंगी।" दादी ने मुँह बनाकर कहा। फिर भी बिट्टू ने ज़िद करके काढ़ा पिला दिया। और योग भी कराया। एक बिट्टू ही था, जिसकी बात दादी मानती थीं। अब तो दादी स्वस्थ होने लगी थीं। और मन ही मन मुस्कुरा रही थीं कि एक बच्चे ने निरोग की राह दिखा दी।

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