निराशा से आशा की ओर
आज कोरोना काल में संपूर्ण मानवता जैसे निराशा में डूब गई है। लगने लगा है जैसे खुशियों का सूरज डूब सा गया है। चारों ओर निराशा ने अपना घर बना लिया है। निराश जीवन, क्या करें क्या ना करें, समझ में नहीं आता। जीवन-मृत्यु के बीच फंस कर रह गया है मानव। घर के अंदर कैसे समय बिताएं और बाहर कोरोना का पहरा है। जीवन से जुड़े सभी कार्य भी करने आवश्यक है। एक बार रोग लग गया तो पता नहीं बचेंगे भी या नहीं। निराश मन कार्य करे जा रहा था।
शनै शनै समय बीता और आशा की किरण ने दरवाजे पर दस्तक दी। ज्ञात हुआ कि कोरोना की दवा बनने लगी है और बाज़ार में जल्दी ही आ जाएगी। निराश और हताश मन को कुछ राहत मिली। दावा किया गया कि दवा से सभी स्वस्थ हो सकेंगे। अनायास ही हृदय प्रफुल्लित हो गया। अभी तो दवा पास आई भी नहीं कि मन स्वस्थ हो गया। लगने लगा जैसे यह जीवन फिर से पहले जैसा हो जाएगा। अब हमें भयभीत या निराश नहीं होना चाहिए।
सही कहा गया है, मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। क्योंकि मन ने ही तो हमारे अंदर भय उत्पन्न कर दिया था। मन ने ही तो स्वयं को निराश कर दिया था। मन ने सोचा था कि अब क्या होगा, अब कैसे बचेंगे।
निराश भावों को किनारे करके यदि हम स्वयं को एकाग्रचित्त कर लें तो हमारे उत्थान का दृढ़ संकल्प निश्चित हो जाएगा। मन पर विजय पा लें तो स्वतः ही आशा की किरण अवश्य जागृत होती है। यदि स्वयं को ईश्वर को समर्पित कर दें और कर्म करें, परिणाम की चिंता ना करें, तो अवश्य विजय होगी।
आशा निराशा मन के दो भाव हैं। निराशा आती है तो आने दें, उसके वश में ना हों। स्वतः ही हमारे निराश भाव आशा में परिवर्तित हो जाएंगे। अंतर्मन की ऊर्जा को विकसित करें और जीवन में स्थिर रहें। मन में विश्वास रखें कि सब अच्छा होगा, तो होगा। हम जैसा सोचते हैं वैसा ही हम बन जाते हैं। इसलिए अपने विचार उच्च रखें। अच्छा स्वतः ही होता जाएगा।।
--गीता सिंह
Nice!
ReplyDeletethnq
ReplyDeleteeverything'll be fine👏
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